आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। जबतक किसी चीज की आवश्यकता नहीं महसूस होती, तबतक उस चीज की खोज नहीं शुरू होती। अगर हमें महसूस हो जाय कि मानव जीवन में गुरु होना अनिवार्य है, तभी गुरु की तलाश प्रारम्भ होगी।
तो सवाल यह है कि, मानव जीवन में गुरु की अनिवार्यता क्यों है?
पहली बात तो यह है कि, आदमी के बच्चे को ज्ञान देना पड़ता है, जबकि जानवर के बच्चे को नहीं।
हम देखते हैं कि, जानवरों के बच्चे चलना, माँ का दूध पीना, यहाँ तक कि तैरना भी, स्वयं सीख जाते हैं, जबकि आदमी के बच्चे को सिखाना पड़ता है।
दूसरी बात यह है कि, मानव जीवन में भटकाव ज्यादा है। जीवन में जो कुछ भी पाने के लिये हम भटकते रहते हैं, वह वास्तु पा लेने के बाद भी अंततः निराशा ही हाथ आती है।
कहीं न कहीं हमारा अंतर्मन जो ढूंढ रहा होता है, उसे हम समझ नहीं पाते और एक स्थिति ऐसी आती है, जब हमारा मन हारता है। जब मन थकता है, तब उसे किसी ऐसी सत्ता की जरुरत महसूस होती है, जिसमें खींचने की शक्ति हो। अर्थात्, गुरूत्व हो।
अक्सर हमारा बाहरी मन, जो जागतिक आकर्षण में बँधा हुआ है, हमें उन रास्तों में भटकाता है, जो अंततः मृगतृष्णा ही साबित होता है।
मन को सही दिशा में ले जाने के लिये, प्रबल गुरूत्व चाहिये, जो किसी सबल गुरु में ही हो सकता है।
अन्यथा मानव जीवन मात्र एक भूल-भुलैया ही बन कर रह जाता है।
मनुष्य शब्द ही मन से बना है और मनुष्य के कर्म उसकी मनोवृत्तियों से बंधे होते हैं। मनःस्थिति या मनोभाव के आधार पर ही, मनुष्य के कर्म निर्धारित होते हैं, और कर्म के अनुसार ही फल।
निष्कर्ष यह कि, यदि कर्मफल में परिवर्तन लाना है, तो मनःस्थिति या मनोभावों में परिवर्तन लाना पड़ेगा। अर्थात् चेतना का परिमार्जन करना पड़ेगा, जो एक सबल गुरु ही कर सकते हैं।
जिस सुख की तलाश में हम भटक रहे हैं, वह स्थायी हो, वास्तविक हो और आंतरिक हो, इसके लिये गुरु चाहिये ही चाहिये।
गुरु की महत्ता को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। यह तो वही अनुभव कर सकता है, जिसे सच्चे गुरु का सानिध्य लाभ हुआ है।
शिव से सबल गुरु कोई हो ही नहीं सकते, इसीलिये कहा गया है कि, “शिव की शिष्यता ही एकमात्र विकल्प“।

