जहाँ तक मुझे लगता है, गुरु कभी शिष्य को नहीं छोड़ते। जब छोड़ते ही नहीं तो फिर से अपनाने का सवाल ही नहीं उठता।
जिंदगी की राह में अच्छी बुरी स्थितियां आती रहती हैं और दुनियां में कोई भी मनुष्य इससे बच नहीं सकता। साहबश्री भी कहते हैं कि, स्वयं शिव भी शरीर में आएंगे, तो उन्हें दुःख उठाना ही पड़ेगा। यही संसार का नियम है।
गुरु शॉक-अब्सॉर्बर का काम करते हैं। जब भी बुरी सड़क आती है गुरू की दया से झटके कम लगते हैं।
रह गया सवाल गुरु कार्य से दूर होने का तो यह भी गुरू के हाथ में ही है।
ऐसा नहीं है कि हम आप गुरू कार्य करते हैं तो बदले में हमारे लौकिक कष्ट दूर होते हैं। शिव गुरू की चर्चा शिष्य भाव के जागरण की अनुपम विधा है और इसका उद्देश्य भी यही है।
कहा गया है कि गुरू की दया अहैतुकि होती है, अर्थात् इसका कोई कारण नहीं होता।
सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का आना और जाना लगा रहता है।
गुरू हमें इनसे लड़ने की समझ और शक्ति देते हैं।
हाँ एक बात और, दुःख कोई ख़राब चीज नहीं है। जितना हम दुःख में पाते हैं उतना सुख में नहीं। अगर दुःख की वजह से ही सही, आप पुनः गुरू की शरण में आ गयी हैं, तो आ तो गयी हैं। यह भी गुरू की दया ही है।
याद रखिये, ये भी गुजर ही जायेगा और गुरु की दया से इसका अहसास कम हो जाएगा।
शायद ये होना भी शिष्य के हित में ही था…
