क्यों नहीं मांगेंगे???
और सुनता कौन है?
जिससे मिलता है, उसी से न माँगा जायेगा?

हाँ साथ में यह भी दया मांगना है कि, आप जो मुझसे चाहते हैं, वो भी मैं कर सकूँ।

शिव-गुरु की दया से शिष्य के लौकिक और पारलौकिक दोनों मनोरथ सिद्ध होते हैं।

एक बात और
कभी कभी हम जिद पर अड़े रहते हैं कि हमें फलाना चीज ही चाहिये, जबकि गुरू हमें कुछ और ही देना चाहते हैं, जो हमारे हित में हो।

जो शिष्य के हित में नहीं, वो गुरु कभी नहीं दे सकते।

इसलिये गुरु से मार्गदर्शन की अपेक्षा भी रखनी चाहिये।

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